Monday, 18 June 2012

रांघेय राघव और शिवदान सिंह चौहान जैसे आलोचकों ने वास्तविक मार्क्सवादी आलोचना को विस्तार देने की कोशिश की तो उसे दबा दिया गया 
हिंदी की पूरी मार्क्सवादी आलोचना, रामविलास शर्मा के अनुयायी के तौर पर आगे बढ़ी है
अरुण कमल की याद दिलायी जानेवाली कविता सचमुच मार्क्सवादी हिंदी आलोचना और रचना के बीच पसरे अंतर्विरोंधों का विद्रूप चेहरा पेश करती है।
मार्क्सवादी आलोचना के बीच पनपने वाली रांघेय राघव और शिवदान सिंह चौहान की परंपरा को कमजोर कर दिए जाने की कवायदें किस तरह से की गयी,वो सब गायब होते चले जाते हैं।

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