मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे/ सूरदास - Hindi Literature
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लेखक: सूरदास. ~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~. मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे। जैसे उड़ि जहाज कौ पंछि, फिरि जहाज पर आवै॥ कमल-नैन को छाँड़ि महातम, और देव को ध्यावै। परम गंग को छाँड़ि पियासो, दुरमति कूप खनावै॥ जिहिं मधुकर अंबुज-रस
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